मलबे में तब्दील लखौरी ईंटे इस बात की गवाही दे रही थीं कि ये मलबा सदियों पुरानी इमारत का हिस्सा था, तेज़ बारिश में मलबे की मिट्टी बह कर गली में चारों तरफ फैल रही थी और आते-जाते लोग उसे रौंदते हुए चले जा रहे थे, ऐसा लग रहा था कि ये कोई मलबा नहीं, बल्कि दफ़्न हो रहा इतिहास हो, अनजाने में ही लोगों के क़दमों तले रौंदा चला जा रहा ये मलबा दिल्ली- 6 के हौज़ क़ाज़ी इलाक़े की एक गली में आज भी मौजूद (नाम मात्र को) हकीम अहसानुल्लाह ख़ान की हवेली का था।
हवेली अहसानुल्लाह ख़ान का एक हिस्सा ढहा बारिश में बदस्तूर 26 अगस्त की दोपहर को इस हवेली का एक हिस्सा फिर भरभरा कर गिर पड़ा, गनीमत रही कि ये दिन छुट्टी का था क्योंकि हवेली के जिस हिस्से का ये मलबा गिरा, उसकी दीवार स्कूल से लगी थी, चूंकि उस दिन स्कूल बंद था इसलिए बड़ा हादसा टल गया।

ख़बर मिलते ही हम हौज़ क़ाजी पहुंचे, तेज़ बारिश में ‘लंबी गली’ नाम का एक तंग रास्ता मिला जिसमें दाख़िल हुए तो सामने झांकता हुआ एक बेहद ख़ूबसूरत नील के रंग की पुताई वाला मेहराबदार दरवाज़ा झांक रहा था। हम ख़ुद को उस तक पहुंचने से रोक न पाए, लेकिन चाह कर भी उस दरवाज़े के क़रीब जाना मुमकिन न था क्योंकि उसके आगे कई ठेले खड़े थे।
बारिश लगातार तेज़ हो रही थी जिसमें भीगते खंडरनुमा दर-ओ-दीवार, टूट कर गिर चुकी खिड़कियां और छज्जे आज भी अपनी ख़ूबसूरती का ऐलान कर रहे थे। इस टूट कर बिखरती इमारत के अधूरेपन में भी एक आकर्षण था।

बची-खुची हवेली के इस हिस्से को देखकर ख़्यालों के घोड़े कितने भी दौड़ा लिए जाएं लेकिन उसकी ख़ूबसूरती का सही अंदाज़ा लगा पाना मुमकिन न था। हम एक मेहराबदार दरवाज़े पर की गई कमाल के नक्काशीदार बेल-बूटों को निहार ही रहे थे कि एक स्थानीय महिला वहां से गुज़री और हमें बताने लगीं कि ”मेरा बचपन यहीं गुज़रा है, हम इस हवेली में कभी खेलने जाया करते थे, ये हवेली अंदर से बेहद ख़ूबसूरत थी, और यहां कुछ शानदार गाड़ियां खड़ी थीं”
कौन थे अहसानुल्लाह ख़ान?
उनकी इस बात ने किताब में पढ़ी उन बातों और किरदारों को सामने ला खड़ा किया जो कभी इस हवेली से वाबस्ता थे, तो आख़िर कौन थे अहसानुल्लाह ख़ान ? उनके बारे मेंविलियम डैलरिंपल अपनी किताब ‘आख़री मुग़ल, एक साम्राज्य का पतन, 1857’ में लिखते हैं कि ” एक बहुत ज़हीन चालाक और सुसंस्कृत आदमी। वह ज़फ़र (बहादुर शाह ज़फ़र) के सबसे ज़्यादा राज़दार और भरोसे के शख़्स थे जिनको ज़फ़र ने अपने वज़ीर-ए-आज़म और निजी हकीम का ओहदा दिया था।”
हालांकि उनके बारे में ये भी पता चलता है कि उन्होंने बहादुर शाह ज़फ़र के ख़िलाफ़ गवाही दे कर अपनी जान बचाई थी और एक तरह से ज़फ़र को धोखा दिया था।
बहरहाल, वो एक लंबी कहानी है, यहां हम हकीम अहसानुल्लाह ख़ान की उस शानदार महलनुमा हवेली की बात कर रहे हैं जो वक़्त के साथ मलबे के ढेर में तब्दील होती चली जा रही है।
कभी ये हवेली एक महल का हिस्सा थी!
इस हवेली के बारे में पवन के वर्मा और सोनदीप शंकर की किताब ‘मैंन्शन्स ऐट डस्क- द हवेलीज़ ऑफ़ ओल्ड दिल्ली में कई दिलचस्प जानकारियां और पुरानी तस्वीरें हैं । वे बताते हैं कि ”यह हवेली एक महल से ज़्यादा थी जो कई हज़ार वर्ग गज में फैली थी और एक पूरे मोहल्ले को कवर करती थी। इसका मुख्य प्रवेश द्वार हौज़ काज़ी के पास, वर्तमान एक्सेल्सियर सिनेमा के बगल में स्थित था जहां आज थियेटर खड़ा है, उसके पीछे मरदाना (पुरुषों का क्षेत्र) था।
थियेटर के पिछले हिस्से की ओर कभी तुर्की स्नानघर (हमाम), बगीचों और अतिथि-गृहों का एक शानदार परिसर था, जहां राजा (ज़फ़र) के मेहमानों समेत ख़ास लोग अक्सर ठहरा करते थे। इसके पीछे जनाना (महिलाओं का क्षेत्र) था। यह विशेष रूप से नक्काशीदार मेहराबों और रंगीन कांच की सजावट वाली एक बेहद ख़ूबसूरत संरचना थी।”

हवेली के एक हिस्से में कभी खुला था सिनेमा हॉल
इस किताब में हवेली में खुल गए एक सिनेमा एक्सेल्सियर की बात की गई है वो भी आज की तारीख़ में बंद हो चुका है और लगातार खंडहर में तब्दील हो रहा है। जिसके बारे में हमने उसी सिनेमा हॉल के सामने हौज़ काज़ी बाज़ार के एक दुकानदार से बात की वे बताते हैं कि अहसानुल्लाह ख़ान की हवेली लगातार ढहती चली जा रही है, वे याद करते हैं कि कभी उन्होंने भी यहां मौजूद सिनेमा में फ़िल्म देखी थी। इसके साथ ही वे बताते हैं कि हौज़ काज़ी में कभी बहुत सी हवेलियां हुआ करती थीं ।
चारदीवारी वाले शहर शाहजहांनाबाद में कभी हकीम अहसानुल्लाह ख़ान की इस हवेली का एक विशेष और गौरवशाली स्थान था, पवन के वर्मा अपनी किताब में बताते हैं कि इसकी छत पर लकड़ी की नक्काशीदार कारीगरी थी ऐसा कहा जाता है कि जिस कलाकार ने लाल किले के दीवान-ए-ख़ास की छत बनाई थी उसी ने इस हवेली की छत भी तैयार की थी, इस हवेली से कभी मुख्य नगर ‘नहर-ए-बहिश्त’ की एक शाखा भी बहती थी।

आज ये हवेली वक़्त की मार झेल रही है लेकिन इससे पहले भी इसकी भव्य ख़ूबसूरती पर हमला हो चुका था। बताते हैं कि 1857 में जब क़रीब चार महीनों के लिए शाहजहांबाद के मालिक सैनिक बन गए थे, तो अंग्रेज़ों के साथ सहयोग करने के शक में संदिग्ध लोगों से सख़्ती से निपटा जा रहा था।
हकीम अहसानुल्लाह ख़ान पर भी अंग्रेज़ों से साथ गुप्त बातचीत करने का संदेह था, और इसी दौरान 7 अगस्त 1857 को शहर में स्थित एक गोला-बारूद का गोदाम धमाके से उड़ गया और शक अहसानुल्लाह ख़ान पर गया कि उन्हीं की मुख़बरी पर अंग्रेजों ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया। वे सैनिकों के ग़ुस्से का शिकार होने ही वाले थे कि ज़फ़र ने उन्हें बचा लिया लेकिन उनकी हवेली गुस्साई भीड़ का निशाना बन गई थी।
उस वक़्त के एक शख़्स ने लिखा कि ”उन्होंने, उनके (अहसानुल्लाह) महल को लूट लिया, जो एक चीनी पेंटिंग की तरह सुंदरता से सजा था, और छत से जुड़ी हर शहतीर और हर कड़ी जो अंगूठी में जड़े पत्थर की तरह मज़बूती से जुड़ी थी, गिरकर राख हो गई। दीवारें धुएं से काली पड़ गईं, मानो महल ख़ुद अपने विनाश पर शोक व्यक्त करने के लिए काले कपड़े पहना चुका हो।”
मिर्ज़ा ग़ालिब और अहसानुल्लाह ख़ान दोस्त थे
अहसानुल्लाह ख़ान के बदले हालात के बारे में शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के ख़तों से भी जानकारी मिलती है, दरअसल ग़ालिब और अहसानुल्लाह ख़ान दोस्त थे।
फिर एक वो दौर भी आया जब अंग्रेजों ने हकीम की संपत्ति को अस्थायी रूप से ज़ब्त कर लिया था लेकिन जिसे बाद में लौटा दिया गया, लेकिन फिर वो पुरानी रौनक ना लौट सकी।
हकीम अहसानुल्लाह ख़ान ने दोबारा अपने घर का क़ब्ज़ा हासिल कर लिया। उन्होंने मुख्य हॉल को जनाना में तब्दील कर दिया और जहां कभी अस्तबल हुआ करता था वहां अपने रहने की जगह बना ली।
लेकिन उनकी मृत्यु के बाद ये हवेली कई हाथों से गुज़री इसमें कई रिश्तेदारों और दोस्तों के नाम शुमार हैं। आज भी उन्हीं में से किसी के नाम ये खंडहरनुमा हवेली दर्ज होगी।
तो जिस ख़ूबसूरत नक्काशी वाले उस पुराने दरवाज़े को देखकर हम ठिठक गए थे बहुत मुमकीन है कि कभी ग़ालिब भी उस दरवाज़े से हवेली के इस हिस्से में दाख़िल हुए हों ।
हम आए तो इस हवेली के बारिश में ढह गए हिस्से को देखने लेकिन इस गली के क़िस्से सुन कर लग रहा था कि कोई तारीख़ी किताब खुल गई हो और जिसका हर पन्ना पलटने पर किसी ख़ास किरदार से मुलाक़ात हो रही थी।
कहां गया पूर्व राष्ट्रपति का घर?
ऐसा ही एक किरदार है बेगम हामिदा सुल्तान जिनका ज़िक्र विलियम डेलरिम्पल अपनी किताब ‘सिटी ऑफ़ जिन्नस’ में करते हैं वे लिखते हैं कि ”अक्टूबर के आख़िर में एक दिन मैं और ओलिविया अचानक अली मंज़िल पहुंच गए, जो बेग़म हामिदा सुल्तान का घर था। यह पुरानी शैली में बसी हुई अंतिम हवेलियों में से एक थी। प्रवेश द्वार से एक संकरा रास्ता नीम और शहतूत के पेड़ों वाले एक छायादार आंगन तक जाता था, इस खुली जगह के दोनों ओर लकड़ी के छज्जे (बालकनी) थे, जिनकी जालियां किसी लेस की तरह बारीकी से गुंथी हुई थीं।
सामने शाहजहांनी मेहराबों वाला एक गलियारा था। ये भारत के पूर्व राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद का घर था”

जी हां, आज हम जिस तंग गली में खड़े थे वे कभी ‘अली मंजिल’ नाम की हवेली थी। जो कभी भारत के पांचवे राष्ट्रपति डॉ. फ़ख़रुद्दीन अली अहमद का घर था, और जिन्होंने 24 अगस्त 1974 को देश के राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। अली मंज़िल, हवेली से तंग गली बन गई
मौजूदा अहसानुल्लाह ख़ान की हवेली से चंद क़दमों की दूरी पर कभी अली मंजिल हुआ करती थी जिसे तलाशते हुए हम एक अंधेरी गली के मुंह पर जाकर ठहर गए, किसी से पूछा कि अली मंजिल कहा है तो जवाब मिला आप वहीं खड़ी हैं, हमारे लिए ये विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि जिस हवेली के ख़ूबसूरत आंगन और आंगन में पेड़ों की छांव के बारे में हमने किताब में पढ़ा था आज वहां लोहे के काम की वर्कशॉप हैं और जहां सूरज की रौशनी भूल कर भी दस्तक नहीं दे सकती।
यहीं एक वर्कशॉप में काम करने वाले एक शख़्स ने बताया कि ” जब मैं छोटा सा था तो यहां एक पुरानी हवेली थी जिसमें हम खेलने आते थे, लेकिन पुराना यहां सब कुछ ख़त्म हो गया, यहां अली मंजिल का पुराना कुछ नहीं बचा, मुझे याद आता है कि 2006 में यहां नीचे दुकानें और ऊपर फ्लैट बना दिए गए। ये फ़ख़रुद्दीन अली अहमद की बहन का घर था, हमने जो सुना है। अंदर पेड़ था, हैंडपंप था, बीच में आंगन था और दोनों तरफ कमरे थे, उनके परिवार के लोग तो हैं पर अब यहां नहीं रहते”
विलियम डेलरिम्पल की किताब ‘सिटी ऑफ़ जिन्नस’ 1993 में पहली बार प्रकाशित हुई थी और उसे लिखने के दौरान या उसके आस-पास डेलरिम्पल यहां गए होंगे और उन्होंने अली मंजिल की रुख़सत होती ख़ूबसूरती का ज़िक्र अपनी किताब में किया। लेकिन आज 2026 में अली मंजिल नाम की जगह पर खड़े हो कर ये यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि जहां आज स्याह अंधेरा है वहां कभी हवादार पेड़ों वाला आंगन था ।
अली मंज़िल: जहां कभी अपॉइंटमेंट लेकर जाना पड़ता था
ये तंग गली किसी ज़माने में कितनी खुली-खुली और अहम थी इसका अंदाज़ा विलियम डेलरिम्पल की किताब में दर्ज बेगम हामिदा सुल्तान की इस बातचीत में मिलता है, वे बताती हैं कि ” वह और उनकी बहन अली मंज़िल से क्वीन मैरीज़ स्कूल तक घोड़ा-गाड़ी में जाया करती थीं। उन दिनों घर लेखकों, संगीतकारों, राजनेताओं और कवियों से भरा रहता था, यहां तक कि बाहरी आंगन में भी प्रवेश करने के लिए पहले समय लेना पड़ता था।”
वे और भी कई बातें बताती हैं जिसमें विभाजन का दर्द, अपनों को खोने की कहानी और दिल्ली के उजड़ जाने की टीस महसूस होती है, वे कहती हैं कि ” मुझे दिल्ली से प्यार था। लेकिन अब दिल्ली मर चुकी है” । जिसमें दिल्ली की अदब की दुनिया से लेकर रिहाइश तक में हुई तब्दीली को वे बयां करती हैं।
वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, दूसरे रिश्तेदार कहां हैं हम तलाश नहीं कर पाए लेकिन 2018-19 की एक खबर बताती है कि असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की जिस आख़िरी लिस्ट में 19 लाख से ज़्यादा लोगों को बाहर कर दिया गया और उसमें कामरूप ज़िले में फ़ख़रुद्दीन अली अहमद के परिवार के कुछ लोगों के भी नाम शामिल थे।

एक गली की कहानी हमें कहां तक ले गई, ये भले ही दिलचस्प लग सकता है लेकिन लौट कर हम फिर उसी उजड़ दायर पर पहुंचे, जहां एक तारीख़ी हवेली का हिस्सा रह-रह कर ढह रहा है, लेकिन कोई नहीं है उसे बचाने वाला ये सब देखकर एक इतिहासकार की वो बात याद आती है जिसमें वे कहते हैं पूरी दुनिया में अपनी विरासत को बचाने और संवारने का शौक प्रशासन के साथ ही आम लोगों में दिखाई देता है लेकिन यहां तो लोगों की आंखों के सामने एक विरासत रफ़्ता-रफ़्ता बिखर रही है लेकिन उसे देखते रहने के सिवाए कोई कुछ नहीं कर पा रहा।
(नजमा ख़ान की रिपोर्ट)